हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,ईरान के मुख्य न्यायाधीश गुलाम हुसैन मोहसिनी ने स्पष्ट किया है कि, देश में अशांति और अव्यवस्था फैलाने वालों के साथ अब किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जाएगी। मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए अटॉर्नी जनरल और सभी प्रांतों के अभियोजकों को निर्देश दिया कि कानून के अनुसार और सख्ती के साथ उपद्रवियों तथा उनके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
ईरानी अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों के साथ पहले दिखाई गई नरमी के बाद अब सख्ती अपनाने के संकेत दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश ने देश में हाल की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि शत्रु तत्व ईरान में अशांति फैलाने की असफल कोशिशें कर रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस्लामी गणराज्य ईरान शांतिपूर्ण विरोध करने वाले नागरिकों और विध्वंसकारी तत्वों के बीच स्पष्ट अंतर करता है।
ईरानी मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जनता और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले तत्वों को कानून के अनुसार निर्णायक जवाब दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि ईरान में महंगाई और मुद्रा के मूल्य में भारी गिरावट के खिलाफ पिछले 9 दिनों से विरोध प्रदर्शन जारी हैं, जिन्हें पश्चिमी मीडिया अपने विशेष दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रहा है।
यह सच है कि महंगाई, बेरोज़गारी और मुद्रा अवमूल्यन जैसी समस्याओं से आम जनता परेशान है, लेकिन इसी असंतोष की आड़ में जिन तत्वों ने हिंसा, आगजनी और अव्यवस्था को बढ़ावा दिया, उन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी नहीं कहा जा सकता। ईरानी न्यायपालिका का यह स्पष्ट करना कि कानून व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वालों के साथ सख्ती बरती जाएगी, किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए असामान्य नहीं है।
इतिहास गवाह है कि ईरान लंबे समय से अमेरिका और इज़रायल के निशाने पर रहा है। प्रत्यक्ष सैन्य टकराव में असफल रहने के बाद इन देशों ने “हाइब्रिड युद्ध” की रणनीति अपनाई है, जिसमें आर्थिक प्रतिबंध, मीडिया प्रोपेगेंडा और आंतरिक अस्थिरता को हथियार बनाया जाता है। पश्चिमी मीडिया द्वारा ईरान की हर घटना को एक खास नजरिए से दिखाना इसी रणनीति का हिस्सा है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि हाल के प्रदर्शनों में कुछ नारे और गतिविधियां स्पष्ट रूप से विदेशी एजेंडों से मेल खाती हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से अफवाहें फैलाना, सुरक्षा बलों को उकसाना और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना किसी भी तरह से जनहित का संघर्ष नहीं हो सकता। ऐसे कृत्य सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करते हैं और आम नागरिकों के जीवन को जोखिम में डालते हैं।
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